सेवा की नई इबारत लिख रहीं सुमित्रा ओझा, 24 वर्षों से जरूरतमंदों को करा रहीं भोजन
बूंदी.KrishnakantRathore/ @www.rubarunews.com- जब व्यक्ति की सोच संवेदनशीलता और परोपकार के भाव से प्रेरित होती है तो सेवा के नए आयाम स्थापित होते हैं। जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति और सकारात्मक सोच से शुरू हुई छोटी-सी पहल भी समय के साथ जनसहयोग से बड़ा सेवा अभियान बन जाती है। बूंदी की सेवानिवृत्त व्याख्याता सुमित्रा ओझा ऐसी ही सेवाभावी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने के साथ ही अपना जीवन असहाय, निर्धन, वृद्ध, दिव्यांग और मानसिक विमंदित लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है।
अन्नपूर्णा बनकर कर रही हैं भूखों की सेवा
शिक्षा के मंदिर में ज्ञान की ज्योत जलाने के साथ प्राणी मात्र की सेवा का भाव रखने वाली सुमित्रा ओझा ने भूख और जरूरतमंदों की पीड़ा को करीब से महसूस किया। अपने पिता स्व. मांगीलाल ओझा से मिली सेवा की प्रेरणा को उन्होंने जीवन का ध्येय बना लिया। वर्ष 2002 में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने पति के साथ श्री गणपति सेवा आश्रम की जिम्मेदारी संभाली और जरूरतमंदों की सेवा का सिलसिला शुरू किया।पेशे से व्याख्याता रहीं सुमित्रा ओझा शुरुआत में विद्यालय की जिम्मेदारियों के साथ अपने अतिरिक्त समय में आश्रम की गतिविधियों का संचालन करती थीं। इस दौरान पारिवारिक और विद्यालय संबंधी चुनौतियां भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने सेवा के संकल्प को कमजोर नहीं पड़ने दिया। वर्ष 2012 में सेवानिवृत्ति के बाद वह पूरी तरह इस सेवा कार्य के प्रति समर्पित हो गईं।
सुमित्रा ओझा बताती हैं कि आश्रम के शुरुआती दिनों में कर्मचारियों का मेहनताना भी वह स्वयं वहन करती थीं। धीरे-धीरे सेवा कार्य की जानकारी लोगों तक पहुंची और जनसहयोग मिलने लगा। आज आश्रम की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति दानदाताओं के सहयोग से हो रही है। वह स्वयं भी प्रतिमाह लगभग तीन हजार रुपये का आर्थिक सहयोग करती हैं।
प्रतिदिन 40 से 50 जरूरतमंदों को निशुल्क भोजन
खोजा गेट स्थित गणेश मंदिर परिसर में संचालित श्री गणपति सेवा आश्रम में प्रतिदिन लगभग 40 से 50 असहाय और निर्धन लोग निशुल्क भोजन ग्रहण करते हैं। इनमें मानसिक विमंदित, वृद्ध और ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें परिवार का सहारा उपलब्ध नहीं है। जो लोग आश्रम तक पहुंचने में असमर्थ हैं, उनके लिए भोजन टिफिन में पैक कर उपलब्ध कराया जाता है।सुमित्रा ओझा ने एक ऐसी बालिका को भी गोद लिया है, जिसके पिता का निधन हो चुका है और मां लकवाग्रस्त हैं। बालिका की शिक्षा और दैनिक जरूरतों की जिम्मेदारी भी वह स्वयं निभा रही हैं।
कोरोना काल में भी जारी रही सेवा
कोविड महामारी के चुनौतीपूर्ण दौर में भी सुमित्रा ओझा ने सेवा का सिलसिला जारी रखा। उस समय जरूरतमंदों और असहाय लोगों को नियमित रूप से भोजन के पैकेट उपलब्ध करवाए गए। आश्रम के समन्वय और बेहतर प्रबंधन की प्रशासन के साथ आमजन ने भी सराहना की।सेवा कार्य से प्रेरित होकर आगे आ रहे भामाशाह
सुमित्रा ओझा की सेवा भावना से प्रेरित होकर अनेक लोग आश्रम से जुड़ रहे हैं। वर्तमान में आश्रम के भंडार में लगभग छह माह तक का राशन उपलब्ध रहता है। जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ और पुण्यतिथि जैसे अवसरों पर लोग यहां भोजन करवाने के लिए आर्थिक सहयोग करते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंदों को मौसम के अनुरूप कपड़े, जूते-चप्पल और अन्य आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध करवाई जाती है।
सेवा के लिए संसाधन नहीं संवेदनशील मन और समर्पित सोच आवश्यक
सुमित्रा ओझा का यह प्रयास बताता है कि सेवा के लिए बड़े संसाधनों से अधिक संवेदनशील मन और समर्पित सोच की आवश्यकता होती है। उनका सेवा कार्य समाज के लिए प्रेरणा है और यह संदेश देता है कि किसी भूखे को भोजन कराना तथा किसी असहाय को सहारा देना ही मानवीय संवेदना की सच्ची अभिव्यक्ति है।
1992 में हुई गणपति सेवा आश्रम की स्थापना
गणपति सेवा आश्रम की स्थापना वर्ष 1992 में स्वर्गीय मांगीलाल ओझा द्वारा की गई थी। हालांकि, इसकी शुरुआत इससे भी पहले हो चुकी थी। ईश्वरीय प्रेरणा से मांगीलाल ओझा अपने घर पर ही भोजन के पैकेट तैयार कर जरूरतमंद एवं असहाय लोगों तक पहुंचाकर अन्न सेवा का कार्य कर रहे थे। समय के साथ जरूरतमंदों की संख्या और भोजन पैकेटों की मांग बढ़ती गई। इससे ओझा जी का सेवा संकल्प और अधिक दृढ़ हुआ तथा इसी संकल्प ने गणपति सेवा आश्रम की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। अंततः वर्ष 1992 में उन्होंने बूंदी के खोजा गेट स्थित गणेश मंदिर परिसर में गणपति सेवा आश्रम की स्थापना कर अन्न क्षेत्र की शुरुआत की। सेवा और समर्पण की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आश्रम का अन्न क्षेत्र आज भी निरंतर एवं निर्बाध रूप से संचालित हो रहा है और जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराने का पुनीत कार्य कर रहा है।
