न्याय व्यवस्था एक डायनेमिक कांसेप्ट है, हर रोज आते हैं नए मामले- दीपक अवस्थी

🔴 कोविड-19 के दौर में वर्चुअल सुनवाई ने न्याय प्रक्रिया को बचाने का काम किया है- उप महाधिवक्ता दीपक अवस्थी

 

■ केंद्र सरकार को वर्चुअल सुनवाई के लिए राष्ट्रीय नीति लाना पड़ेगा

 

दतिया @rubarunews.com>>>>>>>>>>>>> 46 वें राष्ट्रीय वेबीनार में हाइब्रिड वर्चुअल सुनवाई फॉर ईजी एंड फास्ट जस्टिस फ़ॉर कॉमन सिटीजंस विषय पर अपने विचार रखते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व उप महाधिवक्ता दीपक अवस्थी ने कहा की ऐसी चर्चाएं आवश्यक है और यह समय की मांग भी है। हर विषय के अपने फायदे और नुकसान होते हैं और जैसा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य यह है कि कुछ मौलिक विचार मंथन किया जाए और उससे कुछ बातें सामने निकल कर आए जो व्यापक जनहित को प्रभावित करने वाली हों।

उन्होंने बताया कि उनका मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में डार्विन का सिद्धांत काम कर रहा है – स्ट्रगल फॉर एक्जिस्टेंस एवं सर्वाइवल फॉर द फिटेस्ट की बात सामने आ रही है। उन्होंने कहा की वातावरण और समय के अनुरूप व्यक्ति समाज एवं सिस्टम परिस्थितियों के अनुरूप अडॉप्ट करेगा वही सरवाइव करेगा और यही व्यवस्था हमारी न्यायिक प्रणाली में भी लागू होती है। देखा जाए तो हमारी न्यायिक व्यवस्थाएं काफी पुरानी हो चुकी हैं और आधुनिक समय के अनुसार इनमें काफी परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

🔹 *न्याय व्यवस्था एक डायनेमिक कांसेप्ट है, हर रोज आते हैं नए मामले*

दीपक अवस्थी ने बताया कि भारतीय न्याय व्यवस्था एक डायनेमिक कॉन्सेप्ट है जिसमे रोज नए मामले आते हैं। वर्चुअल कोर्ट सुनवाई एक नया कॉन्सेप्ट है। शायद हम में से ज्यादातर लोग यह नहीं विचार किए थे कि कभी ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी। वर्चुअल हियरिंग के विषय में इसके पूर्व के कई वक्ताओं एडीपीओ रीवा सचिन द्विवेदी पूर्व जज डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव ने भी काफी कुछ बताया है पर हमारा यह मानना है कि वर्चुअल हियरिंग वक्त की जरूरत है। इसमें सबसे आवश्यक यह है कि भारतीय संविधान से लेकर सीआरपीसी एवं सीपीसी में भी इसके प्रोवीसो को जोड़ना पड़ेगा। कानूनी वैधता के लिए संविधान में ही संशोधन करना पड़ेगा क्योंकि अभी तक संविधान में वर्चुअल हियरिंग के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। हमारा यह मानना है कि अभी तक यदि सुप्रीम कोर्ट अथवा हाई कोर्ट कोई वैकल्पिक एवं वैयक्तिक व्यवस्था बनाकर वर्चुअल हियरिंग के लिए व्यवस्था बनाता है तो वह सीमित रहेगा।

वर्चुअल अथवा हाइब्रिड हियरिंग किन किन परिस्थितियों में की जा सकती है इसके लिए अमेंडमेंट होना अनिवार्य है। इस विषय में पार्लियामेंट में ई-कमेटी भी गठित हुई है और इसके लिए अनुशंसा भी है लेकिन कानूनी मान्यता मिलना अनिवार्य है। दूसरी बात राष्ट्रीय नीति भी बनाना अनिवार्य है। यह सही है कि हम आज आपस में चर्चा कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट भी बात कर रही है लेकिन भारत सरकार ने इस विषय में क्या कदम उठाए हैं इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। भारत सरकार को इस विषय में बजट व्यवस्था भी बनानी पड़ेगी। अगली सबसे महत्वपूर्ण बात सिक्योरिटी के विषय में आती है। आज हम विभिन्न प्रकार से ऑडियो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के रूप में जुड़ रहे हैं लेकिन यह सब उतने सुरक्षित नहीं है। आज सिक्योरिटी भी एक चिंता का विषय है। यदि यही कार्य एक बजट आवंटन कर भारत सरकार करती है तो उसके लिए बजट आवंटन कर विकसित किया जाएगा जिसके अपने सिक्योरिटी फीचर्स होंगे और जवाबदेही भी होगी। जूम अथवा गूगल मीट आदि में न तो तकनीकी सुरक्षा रहती है और न कोई जवाबदेही। सुप्रीम कोर्ट की जो ई कमेटियां है वह अनुशंसा और निर्देश तो दे सकती हैं लेकिन उनके पास वित्तीय बजट की समस्या है जो कि मात्र केंद्र सरकार के द्वारा ही संभव हो सकता है। न्याय प्रणाली राज्य का मामला नहीं है बल्कि यह मुख्य रूप से केंद्र सरकार का मामला है इसलिए व्यवस्थाएं केंद्रीय स्तर से ही बनानी पड़ेगी।

🔸 *वर्चुअल सुनवाई ने न्याय प्रक्रिया को जीवित रखने का काम किया है*

दीपक अवस्थी ने बताया कि वर्चुअल सुनवाई के अपने अलग लाभ है। वर्चुअल सुनवाई ने देश की न्याय व्यवस्था को बचाने का भी प्रयास किया है। काफी लोगों को न्याय मिला है साथ में वर्चुअल कोर्ट ने हमारे जैसे कई वकीलों की रोजी रोटी भी बचाई है और जीवित रखा है। यह हम जैसे वकीलों के लिए वरदान भी है। क्योंकि हमारे लिए भी अस्तित्व की लड़ाई थी।
सुप्रीम कोर्ट में भी कई प्रकरणों पर वर्चुअल सुनवाई हुई है। सभी बातें ठीक हैं लेकिन वह वहीं आकर रूकती है कि वैयक्तिक के स्थान पर वर्चुअल सुनवाई को सिस्टम में लाना पड़ेगा और यह काम सरकार के द्वारा संभव है जिसके लिए उचित फंडिंग की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। सरकारी नीति के बिना वर्चुअल सुनवाई मात्र कुछ कोर्ट तक ही सीमित रह जाएगी।

🔹 *केंद्र सरकार को वर्चुअल सुनवाई के लिए राष्ट्रीय नीति लाना पड़ेगा*

पूर्व उप महाधिवक्ता दीपक अवस्थी ने बताया कि यह बात स्पष्ट है कि केंद्र सरकार को एक राष्ट्रीय नीति बनानी पड़ेगी तभी कुछ हो सकता है। बजट आवंटन और तकनीक के द्वारा इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था बनानी पड़ेगी जो उच्चतम न्यायालय से लेकर निचले स्तर की न्यायालय के लिए भी काम करेंगे। यह व्यवस्था तब तक सिक्योर और सुरक्षित नहीं कही जा सकती क्योंकि जूम गूगल मीट और अन्य माध्यमों से होने वाली सुनवाई में कहीं से भी सेंध लगाई जा सकती है। यहां पर रीवा से एडीपीओ सचिन द्विवेदी की बात भी सही है कि विटनेस का बयान लेना होता है तो उसके लिए चरित्र महत्वपूर्ण होता है। जज निर्धारित करते हैं कि भाव भंगिमा और करैक्टर कैसा है और यह सब अभी तक फिजिकल हियरिंग के माध्यम से ही संभव हो पाता है।
वर्चुअल सुनवाई में इन चुनौतियों को भी देखना पड़ेगा। श्री अवस्थी ने कहा कि आने वाले समय में फिजिकल हियरिंग के साथ वर्चुअल सुनवाई भी आवश्यक है अतः इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा आदि के द्वारा किया गया जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया।