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डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव को स्वदेशी बायोमेडिकल इम्प्लांट निर्माण तकनीक के लिए मिला भारतीय पेटेंट

बूंदी.KrishnakantRathore/ @www.rubarunews.com-बूंदी की बेटी डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव को रोगी की आवश्यकता के अनुसार अधिक सटीक और किफायती बायोमेडिकल इम्प्लांट बनाने की स्वदेशी तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट प्राप्त हुआ है। उन्होंने डबल-साइडेड इंक्रीमेंटल फॉर्मिंग मशीन विकसित की है, जिसके माध्यम से रोगी की अस्थि संरचना के अनुरूप इम्प्लांट तैयार किए जा सकते हैं।
डॉ. पर्णिका वर्तमान में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जालंधर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। वे राजकीय महाविद्यालय, बूंदी के व्याख्याता डॉ. ए. डी. श्रीवास्तव और डॉ. विजय बाला श्रीवास्तव की पुत्री हैं। उनकी यह उपलब्धि बूंदी के लिए गौरव का विषय है। विकसित मशीन में ऑप्टिकल सेंसर आधारित फीडबैक प्रणाली का उपयोग किया गया है। यह प्रणाली निर्माण के दौरान टूल की स्थिति की लगातार निगरानी कर आवश्यक सुधार करती है। इससे प्रक्रिया नियंत्रण, इम्प्लांट की सतही गुणवत्ता और ज्यामितीय सटीकता बेहतर होती है।
यह आविष्कार अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) द्वारा वित्त पोषित अनुसंधान परियोजना “डिज़ाइन एंड डेवलपमेंट ऑफ एन इलेक्ट्रिकली असिस्टेड हाइब्रिड डबल-साइडेड इंक्रीमेंटल फॉर्मिंग मशीन फॉर एफिशिएंट प्रोडक्शन ऑफ कस्टमाइज़्ड बायोमेडिकल इम्प्लांट्स विद इम्प्रूव्ड सरफेस फिनिश एंड ज्योमेट्रिकल एक्युरेसी” की प्रमुख उपलब्धि है। डॉ. पर्णिका इस परियोजना की प्रधान अन्वेषक हैं। रिसर्च एसोसिएट अरुण शर्मा और शोधार्थी सुधांशु पांडेय भी परियोजना में कार्य कर रहे हैं।
इम्प्लांट निर्माण की लागत में लगभग 90 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना 
वर्तमान में रोगी-विशिष्ट इम्प्लांट के निर्माण में महंगे आयातित उपकरणों और उन्नत एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। अधिक लागत के कारण ये इम्प्लांट विशेष रूप से मध्यम आय वर्ग के रोगियों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। वहीं, मानक आकार के इम्प्लांट प्रत्येक रोगी की अलग-अलग अस्थि संरचना के अनुरूप पूरी तरह फिट नहीं हो सकते।
विकसित स्वदेशी प्रणाली एक डाई-रहित निर्माण प्रक्रिया प्रदान करती है। इसके माध्यम से रोगी के शारीरिक एवं चिकित्सीय डेटा के अनुसार इम्प्लांट को आवश्यक आकार दिया जा सकता है। यह प्रणाली जैव-अनुकूल सामग्रियों के प्रसंस्करण में सक्षम है तथा महंगी डाई और आयातित निर्माण सुविधाओं पर निर्भरता कम करती है। परियोजना के अनुमान के अनुसार, इस तकनीक से इम्प्लांट निर्माण की लागत में लगभग 90 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना है। निर्माण लागत ₹0.5–2 लाख से घटकर लगभग ₹10 हजार हो सकती है। निर्माण अवधि भी 2–4 सप्ताह से घटकर लगभग 2–5 दिन होने का अनुमान है, जिससे रोगी की आवश्यकता के अनुरूप इम्प्लांट कम समय और कम लागत में उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
डॉ. पर्णिका श्रीवास्तव ने कहा कि पेटेंट प्राप्त यह तकनीक रोगी-विशिष्ट इम्प्लांट को अधिक किफायती बनाने, उनकी शारीरिक अनुरूपता में सुधार करने तथा महंगी आयातित विनिर्माण तकनीकों पर भारत की निर्भरता कम करने में सहायक होगी। उन्होंने बताया कि यह उपलब्धि बायोमेडिकल विनिर्माण, व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवा और उन्नत फॉर्मिंग तकनीकों के क्षेत्र में देश की स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।