अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर राज्य स्तरीय विमर्श “मप्र में बाल श्रम के मुद्दे और चुनौतियाँ”

बाल श्रम विरोधी अभियान, मप्र के तत्वावधान में : 

अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर राज्य स्तरीय विमर्श “मप्र में बाल श्रम के मुद्दे और चुनौतियाँ”

बच्चों ने पेश किया माँगपत्र- बाल श्रम के सभी रूपों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए

बाल आयोग बनाएगा बाल श्रम उन्मूलन हेतु एसओपी

भोपाल @rubarunews.com>>>>>>>>>>>>>>> अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर बाल श्रम विरोधी अभियान की मप्र प्रदेश राज्य इकाई के तत्वाधान में एक ऑनलाइन राज्य स्तरीय विमर्श का आयोजन किया गया जिसमे सरकार के विभिन्न विभागों के जिम्मेदार प्रतिनिधि, प्रदेश के अनेक जिलों के संस्था प्रतिनिधि, बाल कल्याण समितियों और चाइल्ड लाइन इकाइयों के सदस्य तथा बाल समूहों के पदाधिकारी शामिल हुए। इस अवसर पर बाल संरक्षण संबंधी प्रशिक्षण मौड्यूल और बच्चों की पत्रिका- पंखुड़ी का विमोचन किया गया।

परिचर्चा मे राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य ब्रजेश चौहान, महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक सुरेश तोमर, सहायक श्रम आयुक्त सुश्री मेघना भट्ट, सेव द चिल्ड्रन से रमाकांत सत्पथी, इंटेरनेशनल जस्टिस मिशन से सुश्री रूबेका और ताल से आमोद खन्ना ने अपने विचार व्यक्त किये। वेविनार में प्रभावी व सफल संचालन संजय कुमार सिंह और सत्येन्द्र पाण्डेय ने किया।

अभियान के राज्य संयोजक राजीव भार्गव ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए बताया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2021 को बाल श्रम उन्मूलन का वर्ष घोषित किया है। इस वैश्विक अभियान को मजबूती देने के लिए, कैंपेन अगेंस्ट चाइल्ड लेबर (CACL) की राज्य समिति ने CLPRA 2016 के 5 साल के बाद जमीन पर स्थिति और बाल श्रम पर कोविड 19 के प्रभाव की समीक्षा करने के लिए एक राज्य स्तरीय अध्ययन किया है जिसको यहाँ प्रस्तुत करके आगे की रण नीति बनाई जाएगी।

राज्य स्तरीय अध्ययन को अभियान की साथी तरन्नुम और स्नेहलता ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इस अध्ययन में दो प्रविधियों का इस्तेमाल किया गया है। पहले मे 18 जिलों 140 गांवों और 41 शहरी बस्तियों मे कोरोना काल के दौरान बाल श्रम की स्थिति का अवलोकन किया गया।

अध्ययन में प्राप्त मुख्य बिन्दु-

81% गांवों और बस्तियों में बच्चे बाल श्रम करते हुए पाए गए।

• तकरीबन 66 प्रतिशत गांवों/ बस्तियों में बच्चे किसी न किसी रूप मे जोखिमपूर्ण काम करते हैं जिनमे फैक्ट्री में काम, खेती मे मशीनों से काम, कीटनाशकों का छिड़काव और जानवरों की देखरेख, कबाड़ बीनना, कुआं खुदाई, स्टोन क्रेशर और ईंट भत्तों मे काम करना आदि शामिल है।

• लगभग 80 प्रतिशत गांवों/ बस्तियों मे 14 साल से काम आयु के करीब 80 प्रतिशत बच्चे पारिवारिक उपक्रमों मे काम करते हुए दिखाई देते हैं।

• तकरीबन 45 प्रतिशत बस्तियों में बच्चे प्रतिदिन 6 घंटे से अधिक देर तक काम करते हैं। जब यही सवाल बच्चों से पूछा गया तो 59 फीसदी बच्चों का कहना था कि वे रोज 6 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। इनमे से 23 प्रतिशत बच्चों की कार्यावधि तो 8 घंटे से भी अधिक है।

करीब 40 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि वे काम छोड़कर पढ़ाई करना पसंद करेंगे।

बाल पंचायत की प्रतिनिधियों- अंकित और निधि ने बच्चों का माँगपत्र प्रस्तुत किया। जिसमे मुख्य रूप से शामिल हैं- माता पिता के लिए रोज़गार उपलब्ध कराना, शिक्षा एवं सरकारी योजनाओ का प्रचार प्रसार करना,शिक्षा हेतु प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराना, ग़रीब बच्चो के लिए प्राथमिक शिक्षा के बाद निःशुल्क शिक्षा एवं जहाँ आवागमन के साधनों की समस्या है वहां छात्रावास उपलब्ध करवाना, प्रत्येक जिले में श्रमोदय विद्यालय की स्थापना होना चाहिए, बच्चों से किसी भी तरह का श्रम कराने वाले नियोक्ता पर वैधानिक कार्यवाही हो, बाल अधिकार अधिनियम को बच्चो के पाठ्यक्रम शामिल करना चाहिए, बाल श्रम को रोकने के लिए प्रत्येक गांव में गठित बाल संरक्षण समितियों को क्रियाशील करना चाहिए, बाल श्रम हेतु गठित जिला स्तरीय टास्क फ़ोर्स सक्रिय हों और उसमे स्थानीय संस्थाओं को शामिल किया जाये।

इस अवसर पर पैनल परिचर्चा को संबोधित करते हुए आमोद खन्ना ने बाल श्रम के पीछे सामाजिक आर्थिक विषमता और गरीबी को बताया और कहा कि समाज से गरीबी को खत्म किये बिना बाल श्रम को समाप्त किया जाना संभव नहीं है। सेव द चिल्ड्रन के रमाकांत सत्पथी ने विभिन्न राज्यों मे बाल श्रम की संपती हेतु किये गए सामाजिक प्रयासों का उल्लेख किया। सुश्री रिबेका ने बंधुआ मजदूरी को खत्म करने के लिए भी काम करने पर जोर दिया। सहायक श्रम आयुक्त सुश्री मेघना भट्ट ने बाल श्रम की समाप्ति हेतु श्रम विभाग द्वारा किये गए प्रयासों की जानकारी प्रदान की। संयुक्त संचालक सुरेश तोमर ने कहा कि बाल श्रम को खत्म किये बिना बच्चों की गरिमा संभव नहीं। उन्होंने समाज की बनावट को बाल श्रम के लिए जिम्मेवार बताया।

राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य श्री ब्रजेश चौहान ने कहा कि बच्चों द्वारा प्रस्तुत माँगपत्र के आधार पर आयोग एक मानक ऑपरेशनल प्रोसीजर बनाएगा जिसके लिए सामाजिक संस्थाएं और संगठन भी सहयोग करें।

इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से जुड़े साथियों ने जमीनी सवाल उठाए जिनका समाधान भी मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ब्रजेश चौहान द्वारा किया गया। दतिया से रामजीशरण राय बालमित्र, संचालक स्वदेश ग्रामोत्थान सामिति ने कहा कि जिलों मे बाल श्रम टास्क फोर्स या तो गठित नहीं हैं अथवा सक्रिय नहीं हैं। आयोग को निरन्तर जिला टास्क फोर्स (DTF) बैठक कार्यवाही व उनके द्वारा किए कार्य और कार्यवाही के परिणाम की रिपोर्ट निश्चित समय अन्तराल में मंगाई जावे। छिंदवाड़ा से महेंद्र खरे ने कहा कि बच्चों के माँगपत्र पर काम होना चाहिए। ग्वालियर से उमेश वशिष्ठ ने कहा कि बाल श्रम बढ़ रहा है परंतु एनसीलपी केंद्र बंद किये जा रहे हैं।

वेविनार के अंत मे प्रदीप नायर सेेेव द चिल्ड्रन ने सभी साथियों और अतिथियों का आभार व्यक्त किया। उक्त जानकारी राजीव भार्गव राज्य संयोजक, CACL मध्यप्रदेश, तरन्नुम मेवाती समन्वयक CACL, सत्येन्द्र पाण्डेय कार्यक्रम प्रबंधक  निवसीड बचपन ने संयुक्त रूप सेे दी।