हाईकोर्ट के ऑर्डर आरटीआई कानून के विरुद्ध होते हैं- सूचना आयुक्त राहुल सिंह 

आरटीआई कानून को सबसे बड़ा खतरा आज कोर्ट से है – शैलेश गांधी

हाईकोर्ट के ऑर्डर आरटीआई कानून के विरुद्ध होते हैं – सूचना आयुक्त राहुल सिंह

सोशल मीडिया के माध्यमों से आरटीआई कानून को मजबूत बनाने चलाई जाए मुहिम – राहुल सिंह RTI पर 30 वें राष्ट्रीय वेबिनार का हुआ आयोजन

 

 

दतिया @rubarunews.com>>>>>>> सूचना का अधिकार अधिनियम जन जन तक कैसे पहुंचे और किस प्रकार एक्ट से जुड़े हुए पेचीदगियों के विषय में आम जनता को जागरूक किया जाए एवं साथ ही इस अधिनियम को और अधिक मजबूत बनाने के लिए क्या क्या प्रयास किए जाएं इन बातों को लेकर प्रत्येक रविवार को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक आयोजित होने वाले राष्ट्रीय जूम वेबीनार के 30 वें सत्र का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने की जबकि विशिष्ट अतिथियों के रूप में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु सम्मिलित हुए। कार्यक्रम का संयोजन प्रबंधन एवं समन्वयन का कार्य अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट नित्यानंद मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी एवं शिवेंद्र मिश्रा के द्वारा किया गया।

*आरटीआई कानून को सबसे बड़ा खतरा आज कोर्ट से है – शैलेष गांधी*

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में सम्मिलित हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि आज आरटीआई कानून को सरकार और न्यायालय दोनों के द्वारा कमजोर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। जब कोई सूचना आयुक्त आदेश पारित कर जुर्माना की कार्यवाही करता है तो दूसरा पीआईओ पक्ष कोर्ट से स्थगन लेकर आ जाता है जिससे आरटीआई कानून और सूचना आयुक्तों की शक्ति को कमजोर किया जा रहा है।

कोर्ट के द्वारा किसी न किसी प्रकरण में आरटीआई कानून का संशोधन किया जाता है जिसमें कभी सूचना देने के पीछे कारण बताए जाने की बात की जाती है तो कभी आरटीआई की धारा 80 के तहत प्राइवेसी की बात कर जानकारी नहीं दी जाती है जिससे आज आरटीआई कानून को सबसे बड़ा खतरा न्यायालय से हो गया है। सूचना आयुक्तों का यह मानना है कि आरटीआई से जुड़े हुए मामलों में कोर्ट को कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए और मामलों में स्थगन तो बिल्कुल ही नहीं देना चाहिए। आज हम आरटीआई कानून को डिफेंड नहीं कर पा रहे हैं इसके पीछे हम सब की नाकामी है और हम सब को मास मूवमेंट चलाकर आरटीआई कानून को मजबूत बनाने की दिशा में आगे आना होगा अन्यथा आरटीआई कानून भी कंजूमर एक्ट की तरह हो जाएगा जो काफी मजबूत कानून था लेकिन आज बहुत कमजोर कर दिया गया है।

कोर्ट की अवमानना के प्रश्न को लेकर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री गांधी ने कहा कि यदि कोर्ट के आदेश का विश्लेषण किया जाए अथवा उसकी समालोचना की जाए तो वह कोर्ट की अवमानना नहीं मानी जाती। इसलिए नागरिकों को बिना किसी अवमानना के भय से कोर्ट के द्वारा दिए जा रहे निर्णय की समालोचना और विश्लेषण अवश्य करना चाहिए जो एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

*हाई कोर्ट के ऑर्डर आरटीआई कानून के विरुद्ध होते हैं – सूचना आयुक्त राहुल सिंह*

कार्यक्रम के दौरान परिचर्चा में अपना विचार व्यक्त करते हुए मध्य प्रदेश के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि आरटीआई से जुड़े हुए मामलों में कोर्ट को स्थगन और हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए इससे कानून कमजोर हो रहा है। हाई कोर्ट के आर्डर आरटीआई कानून के विरुद्ध होते हैं और इसके लिए हम सबको मिलकर सामूहिक प्रयास करना पड़ेगा जिससे कोर्ट को यह पता चले कि यह कानून जनता का कानून है जनता के लिए है और पारदर्शिता लाने के लिए इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। राहुल सिंह का कहना था कि कई मामलों में तो कोर्ट में बैठे हुए जजों को आदेश के बारे में विस्तार से बताया भी नहीं जाता है जिसकी वजह से मामलों में स्थगन दे दिया जाता है और कई बार आरटीआई कानून के विरुद्ध आदेश आ जाते हैं। इसके लिए आरटीआई कानून के पक्ष में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को आगे आकर एक मुहिम चलानी पड़ेगी तभी आरटीआई कानून को बचाया जा सकता है।

*सोशल मीडिया के माध्यमों से आरटीआई कानून को मजबूत बनाने चलाई जाए मुहिम – राहुल सिंह*

वहीं सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि आज सोशल मीडिया की पहुंच हर व्यक्ति तक हो गई है जिसका सहारा लेकर छोटे-छोटे वीडियो और संदेश बनाकर इंटरएक्टिव तरीके से व्हाट्सएप फेसबुक ट्विटर आदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में शेयर किया जाना चाहिए जिसमें आरटीआई कानून के माध्यम से जो नवाचार किए जा रहे हैं और जो लाभ आम जनता को मिल रहा है उसके सकारात्मक पहलुओं को प्रोजेक्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए एक टीम वर्क की जरूरत पड़ेगी जिसमें मास मीडिया से जुड़े हुए लोग सहायता कर सकते हैं। मास मीडिया में छोटी-छोटी क्लिप्स बनाकर शेयर करने और आरटीआई कानून की विशेषता बताने वाले वीडियो शेयर करने से लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और इसे एक मास मूवमेंट की तरह चलाया जा सकता है

*आरटीआई एक्ट का मजाक बनाया जा रहा है – अधिवक्ता एनसी गुप्ता*

वेबिनार कार्यक्रम में शिरकत किये अधिवक्ता एनसी गुप्ता ने कहा कि आरटीआई एक्ट में पब्लिक पार्टिसिपेशन की कमी की वजह से भी यह कानून काफी कमजोर हो रहा है। आरटीआई एक्ट का एक तरह से मजाक जैसा बनाया जा रहा है। जहां तक सवाल केंद्रीय सरकार के कार्यालयों का है वहां इसे कुछ हद तक गंभीरता से तो लिया जाकर 30 दिन के अंदर कुछ न कुछ जवाब तो दे दिया जाता है लेकिन राज्य सरकार से जुड़े हुए कार्यालयों में इसे अभी भी गंभीरता से नहीं लिया जाता जिसकी वजह से पेंडेंसी बढ़ती जाती है और कई वर्षों तक सूचनाएं लोगों को उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। इस कानून को मजबूत बनाने के लिए सूचना आयोग और सरकार के द्वारा अलग से कार्यालय खोले जाने की जरूरत है।

श्री गुप्ता ने कहा कि जो जानकारी असेंबली और पार्लियामेंट में दी जा सकती है वह सब जानकारी आम पब्लिक को साझा की जानी चाहिए लेकिन आज आरटीआई कानून के 16 वर्ष बाद भी धारा 4 के अंतर्गत साझा की जाने वाली ज्यादातर जानकारी पब्लिक की पहुंच से दूर है जो कि इस अधिनियम के सही तरीके से इंप्लीमेंटेशन न होने का कारण बयां करते हैं। इसके लिए सरकार जिम्मेदार है जिसे जनता की सुविधा और पारदर्शिता की कोई परवाह नहीं है।

इस बीच कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, उड़ीसा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल आदि राज्यों से 50 से अधिक सहभागी जुड़े और अपनी अपनी समस्याएं रखी तथा विचार साझा किए। उक्त जानकारी शिवानंद द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता जिला रीवा मध्य प्रदेश ने दी।