RTI द्वारा मप्र की 1148 पंचायतों के 300 करोड़ के घोटाले की खुली पोल

दतिया/ रीवा Ramji sharan Rai @rubarunews.com>>>>लोकल फण्ड ऑडिट रिपोर्ट ने खोल दी मप्र की 1148 पंचायतों के 300 करोड़ के घोटाले की पोल। अपात्र पंचायतों को प्रसाद की तरह बांटी गयी 14 वें वित्त की 300 करोड़ की राशि। रीवा की अपात्र 75 पंचायतों की ऑडिट रिपोर्ट से आई सच्चाई सामने। आर टी आई एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी ने की जांच की माग।

रीवा जिले की 75 पंचायतों में कराधान घोटाले की पर्त खुलने से नए खुलासे हुए हैं। आर टी आई एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा लोकल फण्ड ऑडिट विभाग में दायर आर टी आई में जो जानकारी सामने आई है वह चौकाने वाली है।

🔴 *क्या है लोकल फण्ड ऑडिट और क्यों की जाती है*

लोकल फण्ड ऑडिट प्रत्येक राज्य सरकार की एक ऑडिट टीम एजेंसी होती है जो किसी पंचायत अथवा अन्य संस्था या विभाग को दिए जाने सरकारी राशि की ऑडिट करती है. जिस प्रकार मृतक का पोस्टमोर्टेम डॉक्टर करता है, यांत्रिकीय कार्य की जांच इंजिनियर करता है, ठीक वैसे ही लेखा जोखा और बिल बाउचर की जांच लोकल फण्ड ऑडिट अफसर करता है. किन किन पंचायत्तों में क्या निर्माण कार्य कराये गए, कितना पैसा सरकारी मदों से जारी किये गए, उन कार्यों का किस प्रकार उपयोग किया गया, कहाँ किस निर्माण एजेंसी द्वारा कितनी सामग्री और बिल जारी किये गए, उसका आय-व्यय का व्योरा, यदि किसी पंचायत में करारोपण किया गया तो कहाँ-कहाँ कर लगाये गए आदि का हिसाब और ऑडिट इस लोकल फण्ड ऑडिट टीम द्वारा किया जाता है। यदि वास्तव में देखा जाय तो लोकल फण्ड ऑडिट के बाद ही ज्यादातर मामले स्पष्ट हो पाते हैं की कर की क्या प्रक्रिया अपनाई गयी और कहाँ किस प्रकार से राशि खर्च हुई।




🔴 *कराधान और 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट क्यों है महत्वपूर्ण*

मप्र की 1148 पंचायतों में लगभग 300 करोड़ रूपये की कराधान योजना की राशि दिनांक 28 अगस्त 2019 को सीधे इन पंचायतों के एकल खाते में जारी की गयी थी. यह राशि प्राप्त करने की पात्रता मात्र उन पंचायतों को थी जिन्होंने अपने-अपने पंचायत में करारोपण किया था अर्थात कर लगाया हुआ था। अब इस कर लगाने की जांच और सत्यापन कौन एजेंसी करेगी? निश्चित तौर करारोपण हुआ है इसका सत्यापन मात्र लोकल फण्ड ऑडिट से होता है। सभी ऐसी पंचायतें जो करारोपण की हुई हैं उनको अनिवार्यतः अपनी-अपनी पंचायतों में हर वर्ष करारोपण की राशि एवं साथ में अन्य कार्यों के आय व्यय के व्योरे का लोकल फण्ड ऑडिट टीम द्वारा ऑडिट करवाना होता है. लेकिन हुआ यह की ज्यादातर पंचायतों ने लोकल फण्ड ऑडिट ही नहीं करवाया और जिन्होंने करवाया उनकी ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है की उनके द्वारा कोई करारोपण ही नहीं करवाया गया। कुछ पंचायतें ऐसी भी हैं जिन्होंने अन्य मदों में करारोपण करवाया लेकिन इसका उल्लेख नहीं की किन मदों में करारोपण किया। प्रमुख रूप से जलकर, भूमिकर, संपत्तिकर, दुकान किराया मदों में कोई कर नहीं लगाया गया जबकि पंचायतों में यही मुख्य कर होते हैं. अन्य मदों में जो करारोपण होना बताया गया उससे प्रश्न उठता है की आखिर अन्य कर कौन से हैं. इससे स्पष्ट होता है की यह मात्र फर्जी करारोपण है जिसे राशि हडपने के लिए होना बताया गया है।

🔴 *किस अनुपात में वार्षिक तौर पर बढ़ना चाहिए करारोपण की राशि*

अमूमन 14 वें वित्त आयोग की 2017 -18 की परफॉरमेंस ग्रांट की राशि उन पंचायतों को दी गयी हैं जिनके क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष नियमित तौर पर करारोपण किया गया है और प्रत्येक वर्ष इन करों में वार्षिक तौर पर निश्चित अनुपात में 10 प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि हुई हो। साथ ही जो भी करारोपण का कार्य इन पंचायतों द्वारा हुआ है उनको कर प्राप्ति की राशि को अपने पंचायत के खाते में कर इकठ्ठे करने के बाद एक सप्ताह के भीतर खाते में संचित करना था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इन पंचायतों में कोई करारोपण नहीं किया गया और जो कर लगना बताया गया वह सब फर्जी कर थे. कर की राशि बैंक खातों में भी नहीं रखी गयी। चूँकि कर लगाने की कोई वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया इसलिए इन पंचायतों के पास कोई ऐसे आधार नहीं मिले जिससे यह सिद्ध हो की इन्होने कर लगाया हो।



🔴 *करारोपण की लोकल फण्ड ऑडिट किया जाकर रिपोर्ट भेजी जानी थी भोपाल*

14 वें वित्त आयोग की 2017-18 की कराधान योजना की राशि प्राप्त करने के पूर्व के वर्षों में जो भी कर लगाए गए थे उनका वार्षिक तौर पर किया गया लोकल फण्ड ऑडिट रिपोर्ट पंचायतराज संचालनालय भोपाल में भेजी जानी थी। लेकिन क्योंकि न तो कर लगाया गया और न ही लोकल फण्ड ऑडिट रिपोर्ट ही बनायी गयी इसलिए यह सब जानकारी फर्जी तरीके से कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर गुमराह करने के लिए पंचायतराज संचालनालय भेज दी गयी जिससे इन अपात्र पंचायतों को 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट पाप्त हो गयी।

🔴 *रीवा में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के आरटीआई से हुआ बड़ा खुलासा*

रीवा जिले की 75 पंचायतों में कराधान योजना 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट को लेकर आरटीआई लगाकर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा लोकल फण्ड ऑडिट विभाग मप्र शासन कार्यालय से जानकारी मागी गयी थी। चूँकि प्रारंभ से ही रीवा जिले की सभी 75 पंचायतें प्रश्न के दायरे में थीं अतः इनके द्वारा कौन-कौन से क्या-क्या और कहाँ-कहाँ कर लगाए गए यह स्पष्ट नहीं था। यद्यपि मामले को लेकर शिकायत वरिष्ठ कार्यालयों भोपाल आदि में की गयी थीं लेकिन जांच नहीं हो रही थी. जिसके चलते करारोपण की पात्रता की जानकारी के लिए लोकल फण्ड ऑडिट कार्यालय में आरटीआई लगाकर जानकारी मागी गयी। इसके बाद स्थानीय निधि संपरीक्षा कार्यालय से जो जानकारी प्राप्त हुई उससे अब यह भलीभांति स्पष्ट हो गया कि रीवा की जिन 75 पंचायतों को कराधान योजना की 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट की राशि उनके एकल खातों में जारी की गयी है वह पूर्णतया अवैधानिक और नियम विरुद्ध की गयी है। इनमे से किसी भी पंचायत द्वारा लोकल फण्ड ऑडिट नहीं कराया गया और जिन किन्ही पंचायतों ने लोकल फंड ऑडिट होना बताया भी है वहां भी करारोपण वाले कालम में संपरीक्षक द्वारा टीप में लिखा गया है की कोई करारोपण नहीं कराया गया. मात्र कुछ पंचायतें ऐसी मिली हैं जिन्होंने मात्र 2017-18 में ऑडिट कराया है जिसमे करारोपण में अन्य मदों में करों का लगाया जाना दर्शाया गया है. लेकिन सवाल यह है जब पिछले 2014 से 2018 तक के वर्षों में करारोपण नहीं किया गया और लोकल फण्ड ऑडिट ही नहीं करवाई गयी तो 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट की राशि इन अपात्र पंचायतों को कैसे प्राप्त हो गयी?




🔴 *रीवा जिले की वह पंचायतें जिनका लोकल फण्ड ऑडिट हुआ अथवा नहीं हुआ इसका विवरण निम्नानुसार है -*

गंगेव जनपद की – पुरवा 310, मढ़ी खुर्द, दुवगवां कटहा, संसारपुर, बेला, चंदेह, अकौरी उन्मूलन, दुबहई खुर्द, जोरौट, सिरसा, मदरी, देवास, क्योटी, बांस, गढ़, लालगांव, इनका बिलकुल लोकल फण्ड ऑडिट नहीं हुआ। चूँकि लोकल फण्ड ऑडिट नहीं हुआ अतः कराधान योजना 14 वें वित्त आयोग की राशि प्राप्त होने का इन पंचायतों में सवाल ही नहीं उठता। कराधान योजना 14 वें वित्त आयोग की ग्रांट में स्पष्ट उल्लेख था की उन पंचायतों को यह राशि दी जाएगी जिनमे पंचायतों द्वारा करारोपण किया गया हो अर्थात पंचायतों में कर लगाए गए हों। अतः उक्त पंचायतों को जारी 14 वें वित्त आयोग की राशि पूरी तरह अवैधानिक है।

🔴 *गंगेव की इन पंचायतों का मात्र वर्ष 2017-18 का हुआ लोकल फण्ड ऑडिट*

कराधान घोटाले में सबसे अधिक नाम यदि किसी जनपद का रहा है तो वह है गंगेव. गंगेव जनपद की सेदहा, हिरुडीह, लोटनी, बेलवा कुर्मियान, बसौली नं 2, पचोखर, सिसवा, अगडाल, टिकुरी 32, खरहरी, चौरी, परासी, पनगड़ी कला, मढ़ी कला, तेंदुआ कोठार, कदैला, रघुनाथगंज, लौरी खुर्द, तिवनी पंचायतों में 2014 से लेकर 2020 तक में मात्र वित्तीय वर्ष 2017-18 का ही लोकल फण्ड ऑडिट हुआ है।

इन दर्जनों पंचायतों में जो मात्र वित्तीय वर्ष 2017-18 का लोकल फण्ड ऑडिट हुआ भी है वह भी प्रश्न के दायरे में है क्योंकि करारोपण वाले कॉलम में ऑडिट टीम के संपरीक्षक द्वारा स्पष्ट टीप लगाकर कहा गया की पंचायतों द्वारा कोई कर नहीं लगाया गया। इसी प्रकार गंगेव जनपद की ही बेलवा पैकान, बाबूपुर में मात्र 2016-17 और 2017-18 का लोकल फण्ड ऑडिट होना बताया गया है। ऑडिट टीम ने अपनी टीप में करारोपण का न होना बताया है।

🔴 *हनुमना जनपद की इन पंचायतों में भी नहीं लगाया गया कर*

हनुमना जनपद की अतरैला कला, बधैया, बलभद्रगढ़, बाबनगढ़, भुअरी, दामोदरगढ़, देवरा, ढाबा तिवरियान, गोइडार, हटवा चेक 01, खोडमानी, कोलहा, लासा, लोढ़ी, महोता, मझिगवां, पहाड़ी, पैपखार, पटेहरा, रम कुड़वा, सलैया खास, शाहपुर पंचायतों में वितीय वर्ष 2015-16, 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में लोकल फण्ड ऑडिट टीम द्वारा ऑडिट तो किया गया लेकिन ऑडिट की रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर उल्लेखित है की इन पंचायतों में कोई करारोपण नहीं किया गया और यह सभी पंचायतें कराधान योजना की 14 वें वित्त आयोग की राशि प्राप्त करने की पात्रता भी नहीं रखती थीं।




🔴 *हनुमना सहित जवा, रीवा और रायपुर करचुलियान की इन पंचायतों में भी नहीं लगाया गया कर*

इसी प्रकार हनुमना की शेष पंचायतों सहित जवा और रीवा रायपुर कर्चुलियान जनपदों की कुछ पंचायतों में भी मात्र कुछ विशेष वर्षों में ही लोकल फण्ड ऑडिट टीम द्वारा ऑडिट की गयी जिसमे ज्यादातर पंचायतों में करारोपण होना नहीं पाया गया. इन पंचायतों में हनुमना जनपद की बेलहा में 2015-16, 16-17, 17-18 में, हाटा में 2015-16, 16-17, जवा ब्लाक की डभौरा में 2016-17 में, रायपुर कर्चुलियान के रघुराजगढ़ और सिरसा में 2015-16, 16-17, 17-18, 18-19, 19-20 में लोकल फण्ड ऑडिट टीम की रिपोर्ट प्राप्त हुई है जिसमे कराधान योजना की राशि प्राप्त इन पंचायतों में किसी भी प्रकार से करारोपण का होना नहीं पाया गया है। जवा की डभौरा में मात्र 2016-17 में ऑडिट हुआ जबकि जवा जनपद की ही जवा, बधैया, इटार पंचायतों में किसी भी वर्ष की लोकल फण्ड ऑडिट नहीं हुई।

वहीँ रायपुर कर्चुलियान की रेरुआ खुर्द 559 में 2015 से 2019 तक लोकल फण्ड ऑडिट हुआ जबकि 2019-20 में नहीं हुआ. जो ऑडिट हुआ भी उसमे करारोपण का होना नहीं दर्शाया गया. रायपुर कर्चुलियान की ही तमरादेश और उल्ही खुर्द 55 में 2015 से 2018 तक में लोकल फण्ड ऑडिट होना बताया गया जबकि 2018 से 2020 तक कोई ऑडिट नहीं हुआ। तमरादेश और उल्ही खुर्द 55 में भी जो ऑडिट हुआ उसमे करारोपण नहीं किया गया जिसका ऑडिट टीम द्वारा टीप लगाकर स्पष्ट उल्लेख भी किया गया।

रीवा जनपद की दुआरी और सिरमौर जनपद की दुलहरा पंचायत भी ऐसी दो पंचायतें थीं जिनको रीवा और सिरमौर जनपद से कराधान योजना की 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट राशि प्राप्त करने के लिए चिन्हित किया गया था. यदि इन दोनों पंचायतों दुआरी और दुलहरा के लोकल फण्ड ऑडिट पर नजर डाली जाय तो प्राप्त दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ की दुलहरा और दुआरी पंचायत में 2015 से 2019 तक में लोकल फण्ड ऑडिट हुआ जबकि 2019-20 में नहीं हुआ. यद्यपि दुलहरा और दुआरी में 2015 से 2019 तक लोकल फण्ड ऑडिट होना बताया गया लेकिन करारोपण की स्थिति में नजर डालें तो यहाँ भी क्या कर लगायें कहाँ कर लगाए गए कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है. ज्यादातर वर्षों में करारोपण नहीं किया गया ऐसा लोकल फण्ड ऑडिट टीम की टीप में उल्लेख है।

🔴 *आखिर क्यों नहीं हुई 75 पंचायतों की करारोपण पात्रता की जांच?*

अब सवाल यह है की रीवा जिले की इन 75 पंचायतों में करारोपण की पात्रता की जांच सहित सम्पूर्ण मप्र की 1148 पंचायतों में आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा निरंतर माग की गयी है। इस बाबत जहां कई शिकायतें लोकायुक्त भोपाल, ईओडब्लू भोपाल और पंचायत एवं ग्रामीण विकाश विभाग मंत्रालय भोपाल से लेकर सम्बंधित वरिष्ठ कार्यालयों में की जा चुकी है इससे सवाल यह उठता है की आखिर इस मामले की जांच क्यों नहीं हो रही है। इससे स्पष्ट है की कहीं न कहीं जो माफिया तंत्र इसे प्रभावित हो रहे हैं वह नेताओं, राजनीतिक दलों की वोट बैंक का हिस्सा हैं जिससे यदि जांच होकर सम्पूर्ण तरीके से कार्यवाही होती है तो राजनीतिक दलों का वोट बैंक प्रभावित होगा। आखिर यदि ऐसा नहीं होता तो भला प्रमाणित हो चुके भ्रष्टाचार जैसे मामले में कार्यवाही क्यों नहीं हो पा रही है।




🔴 *भाजपा विधायकों ने घोटालेबाजों के पक्ष में की थी बैटिंग*

अब देखना यह होगा जिस प्रकार रीवा जिले की 75 पंचायतों की करारोपण और लोकल फण्ड ऑडिट रिपोर्ट सामने आई है उससे जांच में गति आती है अथवा हाईकोर्ट में ही जाकर मामले का अंतिम निपटारा होगा। सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने हालाँकि भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुआ कहा की कराधान घोटाले में फंसे ज्यादातर सरपंच और सचिव भाजपा द्वारा ही पालित पोषित रहे हैं जिन्हें बचाने का भाजपा सरकार द्वारा प्रयास किया जा रहा है।

 

इसके पहले भी वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष और देवतालाब के भाजपा विधायक गिरीश गौतम और मनगवां विधायक पंचूलाल प्रजापति ने गंगेव में सरपंचों की मीटिंग लेकर खुले तौर पर इनके पक्ष में बैटिंग की थी और कराधान घोटाले में फंसे सरपंचों को बचाने की बात कही थी। वहीँ पूर्व सहायक लेखाधिकारी बसंतलाल पटेल को गंगेव से हटाने की बाद कही थी। ज्ञातव्य हो की गंगेव जनपद में बसंतलाल पटेल को कराधान घोटाले के सूत्रधार राजेश सोनी के विपक्ष गुट का माना जाता रहा है। जबकि विधायकों ने राजेश सोनी का पक्ष लिया था और उसे बचाने का भी पुरजोर प्रयास कर रहे हैं. घोटाले के प्रमुख आरोपी राजेश सोनी की जमानत याचिका खारिज हो चुकी है और वह जिला पंचायत में बेरोकटोक घूमता रहता है।

🔴 *माफिया मुक्त समाज पर सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर*

एक्टिविस्ट द्विवेदी ने कहा की प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार मुक्त समाज की परिकल्पना पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है। क्योंकि एक तरफ तो मप्र को माफिया मुक्त करने की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं वहीँ दूसरी तरफ माफिया तन्त्र को बढ़ावा दिया जा रहा है और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण। इससे सरकार की दोहरी नीति स्पष्ट हो जाती है।  बता दें की सामाजिक कार्यकर्ता ने मप्र की 23922 पंचायतों में मनरेगा और वित्त आयोग की राशि में बंदरबाट को लेकर निरंतर आवाज बुलंद की है।




ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट और जनसुनवाई के माध्यम से मीटिंग लेकर ग्रामवाशियों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया है. आज रीवा जिले सहित सम्पूर्ण मप्र में पंचायती माफिया को लेकर जिस प्रकार जन आन्दोलन चल रहा है इसका काफी हद तक श्रेय इन्ही पप्रयासों को कहा जा सकता है। आरटीआई के माध्यम से निरंतर घोटालों को उजागर करते हुए कार्यवाही करवाने से जहां पंचायती माफिया सकते में हैं वहीँ प्रशासन पर भी निरंतर दबाब बना रहता है. यदि आरटीआई की बात करें तो अभी हाल ही में मप्र में पंचायतों में धारा 40 और 92 के मामलों को सार्वजनिक करने के लिए सूचना आयुक्त राहुल सिंह का जो निर्णय आया है वह इन्ही प्रयासों का हिस्सा है।  संलग्न 4 पृष्ठों की लोकल फण्ड ऑडिट रीवा से प्राप्त आर टी आई की जानकारी अवलोकन करने का कष्ट करें। शिवानन्द द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिला रीवा ने दी।