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बाघों के स्वागत को बेताब हैं कालदां के जंगल, तैयार हुए घास के मैदान

बूंदी.KrishnakantRathore/ @www.rubarunews.com-रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में बाघों का कुनबा बढ़ने के साथ ही कोर के साथ ही अब बफर जोन के जंगलों में भी बाघों के अनुकूल बनाने के कामों का असर दिखने लगा है। वन विभाग ने दो साल पहले इस क्षेत्र में जुलिफ्लोरा को हटाकर ग्रासलैंड विकसित करने का काम शुरू किया था। वन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को कम कर इन्हें वन्यजीवों के लिए अच्छे आश्रयस्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। रिजर्व में वन्यजीवों से समृद्ध एव जैवविविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण दुर्गम कालदां वन क्षेत्र में कलदां माताजी के निकट 300 बीघा वनभूमि पर विलायती बम्बूल हटाकर सिल्वी पॉश्चर पद्धति से घास के मैदान व प्लांटेशन का काम हाथ में लिया था। दो साल बाद घास के मैदानों में घास तैयार हो गई है तथा शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। शीघ्र ही यहां नए ट्रेकिंग रूट बनाने व अन्य इलाकों में नए ग्रासलैंड विकसित करने की योजना है। वन विभाग की नियमित गश्त व जिला कलेक्टर द्वारा सम्पूर्ण टाइगर रिजर्व क्षेत्र में धारा 163 लगाने से इस वर्ष वन क्षेत्रों में पशुपालकों के प्रवेश व बाड़े बनाने पर रोक लगी है। जिससे यह इलाका बाघों के स्वागत के लिए तैयार होने लगा है। एक महीने पहले शॉफ्ट एनक्लोजर से खुले जंगल में छोड़ी गई युवा बाघिन आरवीटी 8 का रुख कलदां की तरफ है तथा यह कभी भी इन जंगलों में प्रवेश कर सकती है।

जनशून्य व समृद्ध जैवविविधता वाले हैं कालदां के बियाबान जंगल

रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के देवझर महादेव से भीमलत तक के बफर जोन में परम्परागत जलस्रोतों पर 12 माह पानी की उपलब्धता मूक प्रणियों के जीवन का आधार बने हुए हैं। करीब तीन सौ वर्ग किलोमीटर के इन दुर्गम पहाड़ी जंगलों में डेढ़ दर्जन से अधिक स्थानों पर भीषण गर्मी में भी कल-कल पानी बहता रहता है। साल भर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जल उपलब्धता के चलते मूक प्रणियों के लिए बूंदी के जंगल सदियों से प्रमुख आश्रय-स्थल बने हुए हैं। इनमें से कई प्राकृतिक जल-स्रोत तो पहाड़ी की चोटियों पर है जिनमें भीषण गर्मी में भी जल प्रवाह बना रहता हैं। जल उपलब्धता के कारण जिले में भालू, पेंथर सहित अन्य वन्यजीवों का कुनबा बढा है तथा इलाका फिर से बाघों से आबाद होने लगा है।

बाघों के आश्रयस्थल बनेंगे कालदां जंगल के जल-स्रोत

जिले के सुदूर दुर्गम पहाड़ी इलाकों में गर्मियों में भी जल उपलब्धता वाले जल स्रोत जैव-विविधता के वाहक होने के साथ-साथ वन्यजीवों के प्रमुख आश्रयस्थली भी सिद्ध हुए हैं। इनमें पहाड़ी चोटी पर स्थित कालदां माताजी का स्थान प्रमुख है जहां भीषण अकाल में भी पानी का एक बड़ा दह भरा रहता हैं तथा प्राकृतिक रूप से यहां चट्टानों से पानी निकलता है। इसी कारण इसका नाम कालदह पड़ा जो अब कालदां वन खण्ड के रूप में जाना जाता है। इसी पहाड़ी पर उमरथुणा के निकट केकत्या महादेव, सथूर के निकट देवझर महादेव, आम्बा वाला नाला, डाटूंदा के पास दुर्वासा महादेव, पारा का देवनारायण, नारायणपुर के पास धूंधला महादेव, खीण्या-बसोली के पास आम्बारोह, भीमलत महादेव, नीम का खेड़ा के पास झरोली माताजी, खेरूणा के नीलकंठ महादेव आदि स्थान सदाबहार जलयुक्त होने के कारण सदियों से बाघों के पसंदीदा स्थान रहे है। इसी प्रकार भीलवाड़ा जिले के बांका वन खंड के सीता कुंड व भाला कुुुई जैसे महत्वपूर्ण स्थल ही आने वाले समय में टाइगर रिजर्व के बफर जोन में बाघों के प्रमुख आश्रय स्थल सिद्ध होंगे।
🌳पृथ्वी सिंह राजावत🌳
पूर्व मानद वन्यजीव प्रतिपालक 🐯 बूंदी