समकालीन बालसाहित्य में बाल उपन्यास लेखन को लेकर गम्भीर सृजन की ज़रूरत -डॉ सुरेंद्र विक्रम

भोपाल.Desk/ @www.rubarunews.com-समकालीन बालसाहित्य में बाल उपन्यास को लेकर और गम्भीर कार्य करने की आवश्यकता है ,बाल साहित्य खासकर उपन्यास विधा में अभी सृजन की बहुत सम्भावनाएं हैं यह उदगार हैं वरिष्ठ बालसाहित्यकार समालोचक डॉ सुरेंद्र विक्रम के जो लघुकथा शोध केंद्र भोपाल द्वारा आयोजित पुस्तक पखवाड़े के अंतर्गत डॉ मालती बसन्त के उपन्यास ” हिंदी बाल उपन्यास समीक्षा के आईने में ” पर केंद्रित विमर्श गोष्ठी में अपनी बात अध्यक्षीय वक्तव्य में रख रहे थे | उन्होंने आगे विस्तार से प्रस्तुत कृति के महत्व को रेखांकित करते हुए नए बालसाहित्य के शोधार्थियों को इस पुस्तक से शोध को एक नई दिशा मिलेगी ,उन्होंने इस पुस्तक में दिए गए दिशा संकेतों को महत्वपूर्ण बताया साथ ही बाल साहित्य में आलोचना के क्षेत्र में और भी कार्य करने पर बल दिया |इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ बालसाहित्यकार और आलोचक डॉ दिविक रमेश ने कहा कि -‘ वर्तमान समय में बाल उपन्यास लिखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है ,आज के बच्चों के मनोविज्ञान उनकी जिज्ञासाओं को दृष्टिगत रखते हुए बाल उपन्यास लिखे जाना चाहिए उन्होंने साथ ही कहा कि हम सृजन से पूर्व यह भी ध्यान रखें कि कौनसा बच्चा आपके सृजन के केंद्र में है प्रस्तुत कृति की रचनाकार मालती बसन्त को बधाई देते हुए इस कृति को प्रेरणा दायक बताया और आगे भी इस दिशा में सतत सृजन करने का अनुरोध किया |

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ बालसाहित्यकार महेश सक्सेना ने कहा कि -‘ बाल साहित्यकारों को आज उपेक्षित बच्चों पर कलम चलाना चाहिए ,जो बच्चे बाल मजदूर हैं सुदूर ग्रामीण अंचलों में शिक्षा से वंचित हैं उन पर भी साहित्यकारों की दृष्टि जाना चाहिए साहित्य समाज का आईना है तो वहीं साहित्यकार के पास भी एक आईना है जिसमें वह समाज को देखता है और जहां भी ज़रूरी होता है अपनी कलम से उसे चित्रित करता है ,प्रस्तुत कृति के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि बाल उपन्यास कैसे लिखे जाएं उनकी भाषा कैसी हो अभी तक जो बाल उपन्यास लिखे गए उनकी सूची यह सब इस कृति से इसके पाठकों को पढ़ने मिलेगा|

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ व्यंग्य लेखक और बालसाहित्यकार मलय जैन ने कहा कि ‘आज बच्चों का परिवेश तेजी से बदला है साहित्यकारों को बदलते स्वरूप के अनुसार बाल साहित्य का सृजन करना होगा पहले बच्चे घर के बाहर खेलते थे अब बच्चों की दुनिया घर के एक कमरे में सिमट कर रह गयी है ,वहां भी बच्चा ऑन-लाइन से इन-बॉक्स यानी मोबाइल के स्क्रीन और ‘गूगल’ तक सिमट कर रह गया है ,वह न सिर्फ पुस्तकों से दूर हुआ है बल्कि अपने समय से बहुत आगे चल रहा है हम देख रहे हैं और कुछ नहीं कर पा रहे हैं,यह एक बड़ी चुनौती है बच्चों को पुस्तकों से कैसे जोड़ें | कार्यक्रम में शोध केंद्र की ओर से घनश्याम मैथिल ‘अमृत ‘ ने स्वागत उदबोधन दिया एवम लघुकथा शोध केंद्र की निदेशक कांता राय ने आयोजन पर आधार वक्तव्य दिया और पुस्तक पखवाड़े के सफल आयोजन हेतु इससे जुड़ने वाले सभी अतिथियों ,रचनाकारों पाठकों का आभार प्रकट किया |

कार्यक्रम का सफल संचालन गोविंद शर्मा(खंडवा) ने किया ,कार्यक्रम के अंत में कृति लेखिका मालती बसन्त ने सभी उपस्थिजनों का आभार प्रकट किया | इस कार्यक्रम में कर्नल डॉ गिरिजेश सक्सेना, आनन्द तिवारी, अंजली गुप्ता, अरुण अर्णव खरे, अनीता शरद, बबीता कंसुल, चेतना भाटी, चित्रा राघव, पवन जैन , शेफालिका श्रीवास्तव,बिहारी लाल सोनी अनुज, शील कौशिक, विजय जोशी, उषा जायसवाल, विपिन बिहारी वाजपेई,सुनीता बघेल, सत्यजीत राय,मुज़फ्फर इकबाल सिद्दीकी, ज्योत्स्ना कपिल,मृदुल त्यागी ,डॉ ऋचा यादव ,डॉ माया दुबे,डॉ कुमकुम गुप्ता सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे |