तुम्हारे काम दूसरा करें ऐसे भाव मत करना-सुधासागरजी

. कोटा.KrishnakantRathore/ @www.rubarunews.com-  माँ-बाप की सेवा कोई दुसरा कर देवे, कोई उन्हें रोटी खिला दे। भूलकर भी ये भाव मन में भी मत लाना नियम कर लेना अपने और अपनों के कार्य दुसरो से मत करना दुसरा वात हमाशे वड़े है उन लोग से अपने कार्य मत करना हम सब जगह सेवक चाहते हैं मन्दिर की सेवा नौकर करें धर्मिक स्थलों की सेवा गुरु की सेवा किराये लोगों से मत करना भाव तक मत लाना उक्त आशय के उद्गार चन्द्रोदय तीर्थ चाँद खेड़ी में धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महा राज ने व्यक्त किए ।

 

*हमारे देश की संस्कृति व संस्कार का असर है*
हमारे देश की संस्कृति व संस्कार ऐसे हैकि पहले वेटे वेटी की चिन्ता करते हैं इसी प्रकार गुरु जी को आपने नमोस्तू कर लिया अव हमें उसकी चिन्ता हो गई अव आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है आशीर्वाद आपको अपने आप मिल जायेगा आपका नमोस्तू ही आशीर्वाद के लिए उठ जाता है जव जव हाथ उठेगा गुरु का शक्ति हीन भी शक्ति मान वन जायेगा जवजव तुम मन्दिर जाओगे धन हीन भी धनवान हो जायेगा मरने वाला अमर हो जायेगा ये ताकत प्रभु के चरणों में शक्ति हीन शक्ति वान वनकर लौटे धन हीन धनवान वनकर लौटे ये भाव प्रभु चरणों मैं भी प्रार्थना करता हूँ ।

प्रभु चरणों में पापी आया और भगवान के दर्शन करने से शक्ति वड़ जायेगी वह दुनिया में तांडव मचाने लगा रावण को इतनी शक्ति कहा से मिली जाँच होगी तो जैन दर्शन शान्तिनाथ व वैष्णव दर्शन में महादेव पकड़े गये इसलिए हमें कहा गया है कि आशीर्वाद संभल कर देना आहार उसी से लेना जो सातविक हो इसलिए ही साधु सबसे पहले व्यसन का त्याग कराकर आहार ग्रहण करता है यदि मैने रात्रि भोजन करने वाले से आहार ले लिया तो मैं भी नीचे चला जाऊँगा रात्रि भोजन त्याग करने पर तुम्हारी शक्ति वड़ेगी त्याग से शक्ति वड़ती है इसी लिए साधु आपसे त्याग करने की प्रेरणा देते हैं

*भगवान की भक्ति करके पर ही शक्ति वड़ सकतीं हैं*
उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति करने पर ही शक्ति वड़ती है इस व्यक्ति अपनी शक्ति वड़ाना चहता है लेकिन सही उपाय नहीं करता हर नौकर सोचता है कि मैने क्या पाप किया कि मुझे नौकरी करना पड़रही है हर नौकर अपको नकारात्मक ऊर्जा देकर जाता है इसलिए मैने कहा भव मत करना जिससे आप पर असर ना पड़ें ।वो दिन कव आये जव हर इंसान सेठ हो हर इंसान अमीर हो हैं एक स्थान ऐसा अंहेमेन्द्र जिसे किसी की आवश्यकता नहीं है कंठ से अमृत झड़जाता है वह नौकरो की आवश्यकता नहीं है आप यहीं भावना भाना कि मेरी नौकरानी सेठानी वने जिनेन्द्र भगवान एक ही भावना भाते है कि ये मेरा भक्त कव भगवान वने सच्चा गुरु क्या चहता है मेरा हर भक्त मेरे जैसा मुनि महाराज वने ये भाव आते ही दीक्षा दे देते हैं नमोस्तू करते ही गुरु को चिन्ता हो जाती है समारोह का संचालन महावीर भइया ने किया