अपनी बदहाली के खुद जिम्मेदार हैं मीडिया कर्मी 

मुम्बई. शामी एम् इरफान/ @www.rubarunews.com>> ‘कोरोना’ संक्रमण फैलने से मनुष्यों को उनकी अपनी औकात पता चल गयी है. विश्व के मनुष्य, जो पहले ऊंच-नीच, बड़ा-छोटा, जाति-पांति, अमीर-गरीब धन-दौलत के लिए जाने जाते थे, अब मानवता की दुहाई देने लगे हैं. विश्व स्तर पर कोरोना की महामारी का आंकलन करें तो, हमारे देश में स॔क्रमित व्यक्तियों की संख्या और मृतकों की संख्या कम है. सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका में है. तथापि, हम सभी को सचेत रहने की आवश्यकता है. देश हित के लिए ही लाॅक डाउन किया गया है और अभी इसकी अवधि 30 अप्रैल तक बढ़ा दी गई है. फलस्वरूप देश वासियों के समक्ष खाने-पीने की विकराल समस्या उत्पन्न हो गई है. पत्रकारिता से जुड़े व्यक्ति भी इसी देश के अंग हैं. उनके सामने भी समस्या आनी स्वाभाविक है. सरकारी गैर-सरकारी स्तर पर क्या पत्रकारों को कोई सहायता-सहयोग इस दौरान मिल रहा है क्या? यदि कोई सहायता मिल रही है तो किसे? इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है.
देश के कई क्षेत्रों से कुछ पत्रकारों की समस्या संज्ञान में आने के बाद मुझे लगा कि, कुछेक पत्रकारों के अलावा इस फील्ड में कार्यरत विशेष रूप से फ्रीलांसर का कोई माई-बाप नहीं होता. छोटे-बड़े पब्लिकेशन और ब्रॉडकास्टिंग संस्थान यानी टीवी चैनल में कार्यरत रिपोर्टर- संवाददाता सभी को वेतन मिलता है क्या? किसी भी बीट का, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार हो अधिकांशतः अवैतनिक ही होते हैं. अधिकतर पत्रकारों को खबर प्रकाशित -प्रसारित होने के बाद पारिश्रमिक भी नहीं मिलती. कदाचित यही कारण है कि, यह पत्रकार अपनी जीविका के लिए दूसरे स्रोत ढूंढते हैं. और यहीं से शुरू होती है पीत पत्रकारिता.
आपने सुना ही होगा कि अमुक पत्रकार की सैलरी लाखों-करोड़ों में है. कभी आपने सोचा है कि, आपके आस-पास का पत्रकार अपने घर-परिवार की आवश्यकता पूरी क्यों नहीं कर पाते? जब आपको जरूरत पड़ती है तो, आप लेमनचूस माफिक नोट वाला लिफाफा थमा देते हो और वह जरूरतमंद टुकड़ा पाकर आपका गुणगान करने लगता है. फिर वही अपनी जरूरत के लिए ब्लैकमेलर भी बन जाता है. हिस्सा-बांट संवाददाता से लेकर संपादक, प्रकाशक और मालिक तक होता है. इस प्रवृत्ति के कारण ईमानदार पत्रकार का जन्म ही नहीं हो पाता. ऐसे पत्रकार गांव की गली-चौबारे से शहर के गली-कूंचे तक आसानी से मिल जाते हैं. ग्राम पंचायत से प्रदेश की विधान सभा और देश की संसद तक ऐसे ही पत्रकारों का बोलबाला है.
आवश्यकता आविष्कार की जननी है. डिजिटल युग में पत्रकारिता खूब फल-फूल रही है, किन्तु मानवता विहीन, बहुत ही स्वार्थी हो गई है. प्रिंट मीडिया लुप्तप्राय सा प्रतीत होती है. समाचार पत्रों ने पहले ही पत्रकारों को हाॅकर बना दिया था. पत्र-पत्रिका में काम करना है तो, उसके ग्राहक बनाओ, विज्ञापन लाओ और बतौर मेहनताना कमीशन लो. अब ई-पत्रों और यूट्यूब चैनलों की भरमार हो गई है. जिसे देखो वही संपादक, प्रकाशक और मालिक बना है. ऐसे लोगों को न तो सही लिखना आता है और न ही ठीक से बातचीत करने का सलीका मालूम है. यह वही लोग हैं, जो हर खबर के साथ पैसा ऐंठने के चक्कर में रहते हैं. कुछ लोगों को मेरी बात जरूर बुरी लगेगी, लेकिन यह सच है कि ऐसे लोगों द्वारा लेखक- पत्रकारों से भी न्यूज़-व्यूज छापने के लिए मुआवजा मांगा जाता है. इन सबसे जुड़े मीडिया कर्मी कोरोना आपदा के समय संकट में हैं तो, उनके अपने पब्लिकेशन ही मदद नहीं करेंगे.
आजकल के पब्लिकेशन काॅपी-पेस्ट पर ज्यादा निर्भर हैं. यह एक प्रकार से लेखक-पत्रकारों के मौलिक अधिकारों का हनन है. कोई खबर-आलेख यदि नाम के साथ प्रकाशित कर देते हैं तो एहसास कराते हैं कि, उन्होंने बहुत बड़ा एहसान किया है. ऐसे संस्थानों से मदद की उम्मीद कतई न कीजिए. सेवारत वैतनिक मीडिया कर्मी बेशक कुछ लाभ प्राप्त कर चुके होंगे. बाकियों का तो बस अल्लाह-ईश्वर ही सहारा है. ऐसे हाशिये पर रहने वाले पत्रकारों को मानवता के दृष्टिकोण से सहायता मिलनी अति आवश्यक है. हो सकता है कि, इन्हें अपने कर्म का मर्म समझ में आ जाये.
पत्रकारिता जगत में मेरा अनुभव बहुत ही खट्टा-मीठा है. क्राइम, पॉलिटिक्स, एजुकेशनल, सोशल- कलचरल फील्ड में कार्य करते हुए अब तो अपने आपको बॉलीवुड की पत्रकारिता के लिए समेट लिया है. हालांकि, यह कटु सत्य है कि, बतौर फ्रीलांसर बहुत कुछ लिखने के लिए हर विषयों की जानकारी भी रखनी जरूरी है. मानता हूँ, मुझे सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है. फिर भी सच कहूँ तो, फ्रीलांसर बनकर जीविकोपार्जन करना हर किसी के लिए आसान नहीं है. यदि आप सच में परेशान हैं और सचमुच पत्रकार हैं तो, आज की इस आकस्मिक आपदा में अपनी बदहाली के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं. आपको अपनी पहचान खुद बनानी होगी. मुफ्तखोरों से भी नाम-दाम लेकर काम करने की आदत डालनी होगी. किसी कवरेज़ के लिए कन्वेंश लेने की आदत छोड़नी होगी. बचपन में मेरे अब्बा जान की कही बात याद आ रही है कि, ‘बेटा, शौक ऐसा करो, जिससे शोहरत-दौलत हासिल हो.’ और मुझे भी लगता है कि, लेखन-पत्रकारिता पेशा नहीं एक शौक है. मगर मैं शौकिया पत्रकार नहीं कि, छपने के लिए लालायित रहूँ. अगर कुछ लिखता हूँ, कहीं रचना प्रकाशित होती है, तो नाम के साथ प्रकाशित हो और यथोचित पारिश्रमिक भी मिले.
आप पत्रकार हैं. अपने आपको पत्रकार मानते हैं तो, क़लम-कैमरा के साथ अपनी भी आवाज़ उठाओ. खुद फायदा लेकर दूर मत हटो, अपने साथी को भी उसका हक दिलाओ. कुकुरमुत्तों की तरह विस्तारित हो रही पत्रकारिता को बरगद की तरह स्थापित करने में सहयोगी बनें. कभी भी समस्या निकट नहीं आयेगी. एक पत्रकार, जिसे पत्र-पत्रिका को आकार देने का सौभाग्य प्राप्त है, वह अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए हर सपना साकार कर सकता है. माॅ सरस्वती के आशीर्वाद और क़लम रूपी कवच की शक्ति संग होने से कभी भी कोई पत्रकार बेबस-लाचार हो ही नहीं सकता.  (शामी एम् इरफान, वनअप रिलेशंस न्यूज डेस्क,) यह लेखक की  स्वरचित व मौलिक रचना है. यह लेखक  व्यक्तिगत मत है.

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