140 वीं जयंती पर स्मरण प्रेमचन्द को याद करने का अर्थ

भोपाल.शैलेन्द्र शैली/ @www.rubarunews.com- इस दुनिया को पहले से कहीं अधिक बेहतर, शोषण मुक्त, खुशहाल बनाने के लिए प्रतिबद्ध लोग, मानव अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्षरत जुझारू लोग और उनके संगठन यदि आज भी बहुत शिद्दत से महान साहित्यकार प्रेमचन्द जी के अवदान को याद करते हैं तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि प्रेमचन्द जी का महान अवदान हमारे वर्तमान के संघर्ष और प्रतिरोध को जारी रखने और अधिक धारदार बनाने के लिए ऊर्जा देता है। प्रेमचन्द जी का अवदान हमारा प्रेरणास्त्रोत और मार्गदर्शक है।
प्रेमचन्द जी ने कहा था –
हमारी कसौटी पर वहीं साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।
इस कथन को प्रेमचन्द जी ने अपने निबंधों, संपादकीयों, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों में कई-कई तरह से अभिव्यक्त किया। प्रेमचन्द जी ने स्वाधीनता, मानव अधिकारों, किसानों, मेहनतकशों के हितों की रक्षा हेतु अपनी पक्षधरता को व्यक्त किया था।सांप्रदायिक, कट्टरपंथी, प्रतिगामी ताकतों और ब्रिटिश साम्राज्य की सरकार का कड़ा प्रतिरोध किया था। वे सभी जनविरोधी ताकतें अब एकजुट होकर फासीवाद के नए घातक रूप में जनता पर अत्याचार कर रही हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस तरह प्रतिरोध करके अपने रचनात्मक दायित्व का निर्वहन किया था और अभिव्यक्ति के खतरे उठाए थे, वे हमको हौसला देते हैं और रचनात्मक दायित्व का निर्वहन करने के लिए प्रेरित करते हैं।
प्रेमचन्द जी ने जहां एक तरफ अपनी साहित्यिक रचनाओं में विचारों को एक अंतर्धारा के रूप में सहजता से प्रवाहित किया, वहीं दूसरी तरफ अपने निबंधों और पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीयों में साफ-साफ शब्दों में ब्रिटिश सरकार और भारत की कट्टरपंथी, सांप्रदायिक, प्रतिगामी ताकतों की जनविरोधी, प्रतिगामी नीतियों की कड़ी भर्त्सना कर जनता को प्रतिरोध हेतु प्रेरित किया था। प्रेमचन्द जी ने भारत कि स्वाधीनता की कल्पना विश्व दृष्टि के साथ ही की थी। उसमें कहीं से कोई संकुचित, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नहीं था। फासीवादी ताकतों को प्रेमचन्द जी से आज भी डर लगता है। इसलिए उनसे और उनके महान अवदान से परहेज़ करती हैं। इसलिए अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम प्रेमचन्द जी के अवदान को एक वैचारिक हथियार के रूप में साथ लेकर फासीवाद का कड़ा प्रतिरोध करें। प्रेमचन्द जी को याद करने का यह ही सार्थक अर्थ और श्रद्धांजलि है।

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