राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी-बच्चों को समझदार व जिम्मेदार बनाने वाले साहित्य की आवश्यकता – घनश्याम सिंह

बच्चों को समझदार व जिम्मेदार बनाने वाले साहित्य की आवश्यकता - घनश्याम सिंह

दतिया/ @rubarunews.com>>> पी.जी.महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा ‘‘समाकालीन संदर्भ में बाल साहित्य की प्रासंगिकता’’ विषयान्तर्गत आयोजित की जा रही राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी निश्चित ही समयानुकूल है तथा आज समाज और देश को बाल साहित्य के अन्तर्गत ऐसे साहित्य को सृजित करने की आवश्यकता है जिससे हमारी आगे आने वाली पीढ़ी समझदार और जिम्मेदार बनने की दिशा में आगे बढ़े। आज के माहौल में पढ़ने की प्रवृत्ति निरंतर कम होती दिख रही है इसलिए यह आवश्यक है कि बाल साहित्य को ऐसा सरस बनाया जाये ताकि बच्चे पढ़ने में रूचि लें तभी संस्कृति और संस्कार की रक्षा हो सकेगी उक्त विचार पीजी कॉलेज दतिया में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा संगोष्ठी को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर घनश्याम सिंह विधायक सेंवढ़ा एवं अध्यक्ष महाविद्यालय जनभागीदारी समिति ने व्यक्त किए।

इससे पहले प्रमुख वक्ता डाॅ.विकास दवे ने कहा कि बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति को बढ़ाने की महती आवश्यकता है उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि हम बच्चों को खिलोने के रूप में बंदूक पर तो व्यय दरियादिली से करते हैं परंतु बच्चों के लिए सद्साहित्य खरीदने से परहेज करते हैं और दुष्परिणाम हमें भुगतने होते हैं उन्होंने कहा कि बाल साहित्य सृजन करना बच्चों का खेल नहीं है इसमें हमें बहुत गंभीरता और चिंतन की आवश्यकता होती है यदि उपयुक्त बाल साहित्य समाज को उपलब्ध नहीं कराया गया तो हम भौतिक रूप से कितने भी उन्नत क्यों न हो जायें वास्तविक लक्ष्य से दूर ही रहेंगे क्योंकि करुणा और संवेदना केवल सद्साहित्य से ही बच्चों को प्राप्त हो सकती है।

इस अवसर पर चेन्नई से आये डाॅ.ईश्वर करुणा के साथ-साथ डाॅ.के.बी.एल.पाण्डेय, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से पधारे डाॅ.हरीमोहन बुधौलिया द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किये गये। संगोष्ठी के विषय की प्रस्तावना डाॅ.डी.आर.राहुल प्राचार्य एवं डाॅ.निलय गोस्वामी द्वारा प्रस्तुत की गई जबकि कार्यक्रम का संचालन प्रो.डाॅ.रतन सूर्यवंशी द्वारा किया गया उद्घाटन सत्र के अंत में आभार प्रदर्शन डाॅ.इला द्विवेदी द्वारा किया गया।

उद्घाटन सत्र के पश्चात दो तकनीकी सत्र भी देर शाम तक जारी रहे जिनमें विभिन्न स्थानों से आये हुए विषय-विशेषज्ञों द्वारा शोध पत्रों का वाचन किया गया।

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