बंटवारे की हिंसा के बीच अमन का संविधान रचे जाने की पहल : सचिन जैन

भारत के पास एक ऐसे संविधान की ताकत है, जो समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के स्तंभों पर खड़ा है

बंटवारे की हिंसा के बीच अमन का संविधान रचे जाने की पहल

संविधान सभा ने उस वक्त के बहुत संवेदनशील राजनीतिक सवाल यानी अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन के विकल्प को खारिज किया, जिसके कारण भारत आने वाले समय में संभावित नए विभाजनों से सुरक्षित हो पाया. यदि संविधान में सम्प्रदाय और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचन की व्यवस्था होती, तो यह व्यवस्था भारत के लिए बड़े संकट का कारण बनती.

सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैननिदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

बंटवारे की हिंसा के बीच अमन का संविधान रचे जाने की पहल

भारत के पास एक ऐसे संविधान की ताकत है, जो समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के स्तंभों पर खड़ा है

 

जिस वक्त भारत के संविधान को रचे जाने की प्रक्रिया चल रही थी, वह देश के विभाजन का वक्त था. जिस भू-भाग का विभाजन हो रहा था, उस पूरे भू-भाग में साम्प्रदायिक हिंसा की आग जल रही थी. मारकाट मची हुई थी. ऐसे में संविधान सभा के सामने यह चुनौती थी कि वह इन तात्कालिक घटनाओं से प्रेरित होकर अपने संविधान को धर्म-निरपेक्षता और लोकशाही के विचार को त्याग कर तानाशाही और सैन्य शासन की व्यवस्था को न अपना ले. भारत ने इंसाफ और इंसानियत को तवज्जो दी और साम्प्रदायिक हिंसा के बीच अपने मन को शीतल बनाए रखा. इसी का परिणाम है कि भारत के पास एक ऐसे संविधान की ताकत है, जो समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय के स्तंभों पर खड़ा है.वास्तव में बंगाल विभाजन (वर्ष १९०४-०५) से लेकर वर्ष १९४० के बीच साम्प्रदायिकता का रूप उतना बर्बर नहीं था, जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान हुई भीषण हिंसा के कारण हो गया. यह सच स्वीकार करने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि इतिहासकार प्तेरिक फ्रेंच ने अपनी पुस्तक लिबर्टी ओर डेथ में लिखा है कि वास्तव में भारत का विभाजन व्यक्तित्वों के टकराव की राजनीति के कारण अपने मुकाम पर पहुंचा. मूलतः मोहम्मद अली जिन्ना राजनीति में धर्म के प्रवेश में विश्वास नहीं रखते थे, और जिस तरह महात्मा गांधी ने राजनीति को आध्यात्म से जोड़ा, वे उससे सहमत नहीं थे. वर्ष १९१६ में वे मुस्लिम लीग और कांग्रेस, दोनों से ही जुड़े हुए थे और हिन्दू-मुस्लिम एकता के पैरोकार माने जाते थे. उसी वक्त महात्मा गांधी के नेतृत्व में उभार के चलते, उनकी राजनीति के तौर तरीकों में बद्लाव आया. वर्ष १९२० में एक कार्यक्रम में महात्मा गांधी को “मिस्टर गांधी” कहकर संबोधित किया था, जिससे उनके प्रति नकारत्मक माहौल बना, जबकि गांधी जी ने कहा था कि जिन्ना ने उनका कोई अपमान नहीं किया है. मोहम्मद अली जिन्ना के अन्य नेताओं से मतभेद बढ़ते गए. वर्ष १९४० में मुस्लिम लीग के नेता के रूप में उन्होंने मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की मांग सामने रख दी. लीग के भीतर वरिष्ठ नेताओं से वे यह कहते थे कि अलग राष्ट्र की मांग केवल समझौते के लिए दबाव बनाने के लिए है, लेकिन बाद में बात किसी से संभाली न गयी. इसके बाद दुसरे विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस के कई नेता कारागार में दाल दिए गए, तब मो. अली जिन्ना ने खुद को मुसलमानों के नेता के रूप में स्थापित करने की राजनीति की. इस कारण वे नेहरु से बहुत दूर हो गए. दूरियां बढती गयीं और वर्ष १९४६ में कलकत्ता से साम्प्रदायिक दंगे शुरू हो गए. कांग्रेस पहले विभाजन के खिलाफ थी, किन्तु जिस तरह की हिंसा हुई और जिस तरह से सियासत ने साम्प्रदायिक रूप अख्तियार किया, उसके बाद कांग्रेस ने भी विभाजन को अंतिम विकल्प मान लिया. कहा जाता है कि उस विभाजन ने लगभग एक करोड़ लोगों की जान ली. बहुत संभव था कि इस नरसंहार के प्रभावित होकर भारत हिंसात्मक रुख अपनाता, तानाशाही या सैन्य सरकार का विकल्प चुनता और हमेशा के लिए हथियारों को सत्ता के हाथ में दे देता. किन्तु बहुत दर्द सहने के बाद भी, बहुत संयम रखते हुए भारत ने साम्प्रदायिकता को व्यवस्था का स्वभाव नहीं बनने दिया. इसलिए भारत की राजनीति सादर और सम्मान की पात्र है।

 

 

१३ दिसंबर १९४६ को संविधान सभा में भारत की स्वतंत्रता का घोषणा पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें लोकतांत्रिक, मानव अधिकार आधारित समतामूलक और अल्पसंख्यकों का संरक्षण करने वाली व्यवस्था का सपना देखा गया।

 

उल्लेखनीय है कि संविधान सभा ने मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सबसे महत्वपूर्ण विषय माना और इसीलिए संविधान सभा ने सञ्चालन नियम बनाने और सलाहकार समिति के गठन के बाद २४ जनवरी १९४७ को सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में अल्पसंख्यक समुदाय और मौलिक अधिकार सम्बन्धी सलाहकार समिति का सबसे पहले गठन किया।

 

अल्पसंख्यक सम्बन्धी परामर्श समिति की रिपोर्ट

अल्पसंख्यक/अल्पमत सम्बन्धी परामर्श समिति की रिपोर्ट सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 8 अगस्त 1947 को जमा की. जिस पर 27 अगस्त 1947 को चर्चा शुरू हुई. इस समिति को चार पहलुओं पर निर्णय लेकर रिपोर्ट तैयार करना थी; उनमें से महत्वपूर्ण था चुनाव संयुक्त विधि से हो या पृथक और पासंग (प्रतिनिधि अनुपात) के जरिये. समिति की रिपोर्ट में लिखा गया है कि “बहुत बड़े बहुमत से यह निश्चय किया है कि पृथक चुनाव विधि को अवश्य ही इस विधान से निकाल दिया जाना चाहिए. हमारे विचार में भूत में इस विधि ने साम्प्रदायिक भेदों को इस घातक सीमा तक भड़का दिया कि वे आज स्वस्थ राष्ट्रीय जीवन की उन्नति के रास्ते में मुख्य रुकावट का साधन बने हुए हैं. देश में नए राजनीतिक हालात पैदा हो गए हैं, उनमें तो इन खतरों को हटाना और भी आवश्यक जान पड़ता है. अतः हम सिफारिश करते हैं कि केन्द्रीय और प्रांतीय धारा सभाओं के सब चुनाव सम्मिलित चुनाव विधि से होने चाहिए. हमने यह भी सिफारिश की है कि सामान्य सिद्धांत के रूप में विविध धारा सभाओं में भिन्न-भिन्न स्वीकृत अल्संख्यकों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात से ‘स्थान” भी सुरक्षित कर दिए जाएं. ताकि कहीं अल्पसंख्यकों को यह आशंका न हो जाए कि असीमित सम्मिलित चुनाव विधि का प्रभाव धारा सभाओं में उनके प्रतिनिधित्व के परिमाण पर बुरा न पड़े. इसमें जिन समुदायों की जनसंख्या डेढ़ प्रतिशत से कम और ज्यादा है, उन्हें शामिल किया गया. इसमें एंग्लो इन्डियन, पारसी, आसाम के मैदानी कबीले के लोग, भारतीय ईसाई, सिख, मुसलमान और परिगणित जातियां शामिल थीं.”

 

संविधान सभा ने उस वक्त के बहुत संवेदनशील राजनीतिक सवाल यानी अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन के विकल्प को खारिज किया, जिसके कारण भारत आने वाले समय में संभावित नए विभाजनों से सुरक्षित हो पाया. यदि संविधान में सम्प्रदाय और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचन की व्यवस्था होती, तो यह व्यवस्था भारत के लिए बड़े संकट का कारण बनती.

 

चौधरी खालिकुज्ज्मां ने कहा कि “यदि मुसलमानों को पृथक चुनाव का अधिकार दे दिया जाए तो वे समझेंगे कि उनकी उचित शिकायतों और मांगों को व्यक्त करने के लिए धारासभाओं में वे अपने सच्चे प्रतिनिधि भेज सकते हैं. इन प्रतिनिधियों को इस मकसद के लिए किसी दूसरी शक्ति या सरकार अर्थात पाकिस्तान सरकार पास नहीं जाना है. उन्हें तो ये शिकायतें और मांगें आपके सामने ही रखनी हैं.”

 

सरदार पटेल ने दिया ये जवाब

जवाब में सरदार पटेल ने कहा था कि “मुझे पृथक चुनाव के समर्थन में रखे गए प्रस्तावों को सुनकर अफ़सोस हुआ. इस व्यवस्था ने भारत का विभाजन किया. दो टुकड़े किये. जब पाकिस्तान को स्वीकार किया गया तो यह बात समझी गई कि शेष हिन्दुस्तान जो कि पूर्ण भारत का 80 प्रतिशत है, केवल एक राष्ट्र ही माना जाएगा. हम पृथक चुनाव को इसलिए मांगते हैं क्योंकि इससे हमारा भला है, यह कहने से अब कोई लाभ नहीं. हम इसे पर्याप्त समय तक सुन चुके हैं. इस आंदोलन के परिणामस्वरूप ही आज हम एक जुदा राष्ट्र बन गए. आंदोलन यह था कि हम एक पृथक जाति हैं अतः पृथक चुनाव, पासंग, और ऐसी ही दूसरी सुविधाएँ हमारी रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए हमें एक पृथक राजसत्ता दे दीजिए. परन्तु शेष हिन्दुस्तान में अर्थात बाकी 80 प्रतिशत हिन्दुस्तान में क्या आप केवल एक जाति के अस्तित्व को अंगीकार करेंगे? या आप अब भी यहां दो जातियों की बात को पुनः उठाना चाहते हैं? मुझे कोई भी स्वतंत्र देश ऐसा दिखलाइये कि जहां पृथक चुनाव विधि प्रचलित हो…… इससे सर्वत्र कष्ट का उदय होगा, जिसके कारण यहां रहना भी मुश्किल हो जाएगा.”

 

साम्प्रदायिकता के सवाल पर संविधान सभा कदम-कदम पर सचेत थी. मौलिक अधिकार समिति ने भी यह प्रस्ताव रखा था कि “सरकारी कोष द्वारा संचालित अथवा सहायता प्राप्त किसी स्कूल में दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा में भाग लेने या धार्मिक पूजा में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. इस पर आर. वी. धुलेकर ने स्कूल के बजाये ‘शिक्षणालय’ शब्द के उपयोग का सुझाव दिया. पूर्णिमा बैनर्जी ने कहा कि हमने देखा है कि धार्मिक आधार पर चलाई जाने वाली अनेक शिक्षण संस्थाओं में इस प्रकार की धार्मिक शिक्षा दी जाती है कि बच्चे की बुद्धि को परिमार्जित करने के स्थान में उनकी बुद्धि को दूषित करते हैं और कभी-कभी एक विशेष प्रकार का धार्मिक अंधविश्वास तथा कट्टरपन उत्पन्न हो जाता है.”

 

बी. पोकर साहब बहादुर ने कहा कि “स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में किसी खास धर्म के पाठ होने के बजाये उन धर्मों के नैतिक पहलुओं से सम्बंधित विचार शामिल किये जाएं. ये विचार किसी एक धर्म से सम्बंधित न हों, बल्कि सभी धर्मों के समान रूप से होने चाहिए.”

 

एफ.आर. एंथनी ने कहा था कि “मैं समझता हूं कि आज के हालात अल्पसंख्यकों के लिए एक चुनौती हैं. प्रत्येक बुद्धिमान अल्पमत उस भावी समय की ओर देख रहा है जबकि वह साम्प्रदायिक चिन्ह या नाम का परित्याग करके सारी भारतीय जाति में घुल मिल जाएगा. याद रखो ऐसा समय जल्दी आये या देर से, पर आएगा अवश्य.”

 

वर्तमान भारत के अनुभव बताते हैं कि आज़ादी के बाद जिन घावों को भरने के लिए मरहम पट्टी करने की जरूरत थी, उन्हें कुरेद-कुरेद कर ज़िंदा बनाए रखा गया. अपनी राज्य व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से जनमानस में भरे हुए साम्प्रदायिकता के जहर को निष्क्रिय करने की जरूरत थी, किन्तु ऐसे प्रयास नहीं ही किये गए. जिस ढाँचे (जातिवाद) को तोड़ने का वायदा संविधान ने किया था, राजनीति ने उस ढाँचे को तोड़ने के बजाये, उसे संरक्षण देने का काम किया. हम भारत में माता-पिताओं को यह सिखा ही नहीं पाए, कि भेदभाव और छुआछूत आखिर में किसी एक समुदाय को प्रभावित नहीं करते हैं, ये पूरे समाज को दूषित करते हैं. भारत ने आर्थिक तरक्की की, किन्तु उस तरक्की का लाभ ९० प्रतिशत भारतीयों तक नहीं पहुँच पाया. भारत में ऊंची जातियों की तुलना में आदिवासी और अनुसूचित जाति समुदायों में बच्चों की मृत्यु ज्यादा होती है, ऐसे समुदाय भुखमरी के शिकार होते हैं और उन्हें गरिमामय जीवन का अधिकार नहीं है…क्यों? क्या हम ऐसे भारत पर गर्व कर सकते हैं?

 

सचिन कुमार जैन

सचिन कुमार जैन निदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता

 

सचिन कुमार जैन ने पत्रकारिता और समाज विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद समाज के मुद्दों को मीडिया और नीति मंचों पर लाने के लिए विकास संवाद समूह की स्थापना की. अब तक 6000 मैदानी कार्यकर्ताओं के लिए 200 प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर चुके हैं, 65 पुस्तक-पुस्तिकाएं लिखीं है. भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान और हम सरीखी पुस्तकों के लेखक हैं. वे अशोका फैलो भी हैं. दक्षिण एशिया लाडली मीडिया पुरस्कार और संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित.

 

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